ASTROLOGER, Spiritual Healer & Mantra - Yantra - Tantra Sadhak (ज्योतिषी, आध्यात्मिक चिकित्सक व मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र साधक)
Friday, 22 March 2013
Tuesday, 19 March 2013
शिव ही सर्वस्य ::
शिव ही सर्वस्य ::
शिव आदि देव है। वे महादेव हैं, सभी देवों में सर्वोच्च और महानतमें शिव को ऋग्वेद में रुद्र कहा गया है। पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है। श्वेता श्वतरोपनिषद् के अनुसार ‘सृष्टि के आदिकाल में जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। न दिन न रात्रि, न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव (रुद्र) ही थे।’ शिव पुराण में इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है -
‘एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’ सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला। शिव की सत्ता सर्वव्यापी है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है-
‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।
में शिव, तू शिव सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्।
शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मेंगल, परम कल्याण।
ॐ नम: शिवाय
शिव आदि देव है। वे महादेव हैं, सभी देवों में सर्वोच्च और महानतमें शिव को ऋग्वेद में रुद्र कहा गया है। पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है। श्वेता श्वतरोपनिषद् के अनुसार ‘सृष्टि के आदिकाल में जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। न दिन न रात्रि, न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव (रुद्र) ही थे।’ शिव पुराण में इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है -
‘एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’ सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला। शिव की सत्ता सर्वव्यापी है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है-
‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।
में शिव, तू शिव सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्।
शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मेंगल, परम कल्याण।
ॐ नम: शिवाय
Wednesday, 13 March 2013
नयी जानकारी आज बाते करेगे दक्षिणावर्ती शंख के बारे में
नयी जानकारी आज बाते करेगे दक्षिणावर्ती शंख के बारे में
1 - दक्षिणावर्ती शंख हर घर में अवश्य होना चाहिए
2 - इसके बिना लक्ष्मी जी की आराधना पूर्ण नहीं होती है
3 - इसकी नित्य आराधना करने से धन की कमी नहीं होती
4 - इसमे जल भरकर " श्री सूक्त " का पाठ करके उस जल को दुकान - आफिस में
छिड़कने से ब्यापार में बढ़ोतरी होती है
5 - इससे पितरो को तर्पण करने से पितृ - दोष की शांति होती है
6 - इससे घर की नकारात्मक उर्जा समाप्त होती है
7 - इसमे जल भरकर निम्न मन्त्र का जप करके इस जल को पीने से - हृदय और श्वास
संबधित रोगों से मुक्ति मिलती है --
"ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः
1 - दक्षिणावर्ती शंख हर घर में अवश्य होना चाहिए
2 - इसके बिना लक्ष्मी जी की आराधना पूर्ण नहीं होती है
3 - इसकी नित्य आराधना करने से धन की कमी नहीं होती
4 - इसमे जल भरकर " श्री सूक्त " का पाठ करके उस जल को दुकान - आफिस में
छिड़कने से ब्यापार में बढ़ोतरी होती है
5 - इससे पितरो को तर्पण करने से पितृ - दोष की शांति होती है
6 - इससे घर की नकारात्मक उर्जा समाप्त होती है
7 - इसमे जल भरकर निम्न मन्त्र का जप करके इस जल को पीने से - हृदय और श्वास
संबधित रोगों से मुक्ति मिलती है --
"ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः
Monday, 11 March 2013
मूर्ति की परिक्रमा हमेशा सीधे हाथ की तरफ से करना चाहिए क्योंकि...
मूर्ति की परिक्रमा हमेशा सीधे हाथ की तरफ से करना चाहिए क्योंकि...
मंदिर या देवालय वह स्थान है जहां जाकर कोई भी व्यक्ति मानसिक शांति महसूस
करता है। किसी भी मंदिर में भगवान के होने की अनुभूति प्राप्त की जा सकती
है। भगवान की प्रतिमा या उनके चित्र को देखकर हमारा मन शांत हो जाता है और
हमें सुख प्राप्त होता है। हम इस मनोभाव से भगवान की शरण में जाते हैं कि
हमारी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी, जो बातें हम दुनिया से छिपाते हैं वो
भगवान के आगे बता देते हैं, इससे भी मन को शांति मिलती है, बेचैनी खत्म
होती है।
श्रद्धालु जब मंदिर या किसी देव स्थान पर जाते हैं तो आपने
उन्हें देवमूर्ति की परिक्रमा करते हुए देखा होगा। दरअसल परिक्रमा इस कारण
की जाती है क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि देवमूर्ति के निकट दिव्य
प्रभा होती है।इसलिए प्रतिमा के निकट परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के
ज्योतिर्मंडल से निकलने वाले तेज की सहज ही प्राप्ती हो जाती है।
लेकिन
देवमूर्ति की परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से करनी चाहिए क्योकि दैवीय
शक्ति की आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है। बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा
करने पर दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मंडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य
परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है।
जाने-अनजाने की गई उल्टी परिक्रमा का दुष्परिणाम भुगतना पडता है।
Saturday, 9 March 2013
महाशिवरात्रि कल: इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त
महाशिवरात्रि
कल: इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा,
जानिए शुभ मुहूर्त
महाशिवरात्रि (इस बार 10
मार्च, रविवार)
के दिन भगवान शिव की पूजा करने से
विशेष फल मिलता है। जो व्यक्ति इस दिन
भगवान शिव के निमित्त व्रत रखता है
उसे अक्षय पुण्य मिलता है। धर्म
शास्त्रों में महाशिवरात्रि व्रत के संबंध में
विस्तृत उल्लेख है। उसके अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत इस प्रकार करें-
शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन व्रती (व्रत करने वाला) सुबह जल्दी उठकर स्नान संध्या करके मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन करें। इसके बाद श्रृद्धापूर्वक व्रत का संकल्प इस प्रकार लें-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।
यह कहकर हाथ में फूल, चावल व जल लेकर उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हुए यह श्लोक बोलें-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।
रात्रिपूजा
व्रती दिनभर शिवमंत्र (ऊँ नम: शिवाय) का जप करे तथा पूरा दिन निराहार रहे। (रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।) धर्मग्रंथों में रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर में जाकर अथवा घर पर ही (यदि नर्मदेश्वर या अन्य कोई उत्तम शिवलिंग हो) पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का संकल्प इस प्रकार लें-
ममाखिलपापक्षयपूर्वकसलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थं च शिवपूजनमहं करिष्ये
व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर के पूजन में शिवपंचाक्षर (नम: शिवाय) मंत्र का जप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान, इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान की आरती व परिक्रमा करें। अंत में भगवान से प्रार्थना इस प्रकार करें-
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृत्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
संतुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।।
अगले दिन सुबह पुन: स्नानकर भगवान शंकर की पूजा करके पश्चात व्रत खोलना चाहिए।
पूजन के शुभ मुहूर्त
सुबह 8:10 से 9:40 बजे तक (चर)
सुबह 9:40 से 11:08 बजे तक (लाभ)
सुबह 11:08 से दोपहर 12:30 बजे तक (अमृत)
दोपहर 2:06 से 3:35 बजे तक (शुभ)
शाम 6:32 से रात 8:00 बजे तक(शुभ)
रात 8:00 से 9:30 बजे तक (अमृत)
रात 9:30 से 11:00 बजे तक (चर)
शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन व्रती (व्रत करने वाला) सुबह जल्दी उठकर स्नान संध्या करके मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन करें। इसके बाद श्रृद्धापूर्वक व्रत का संकल्प इस प्रकार लें-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।
यह कहकर हाथ में फूल, चावल व जल लेकर उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हुए यह श्लोक बोलें-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।
रात्रिपूजा
व्रती दिनभर शिवमंत्र (ऊँ नम: शिवाय) का जप करे तथा पूरा दिन निराहार रहे। (रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।) धर्मग्रंथों में रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर में जाकर अथवा घर पर ही (यदि नर्मदेश्वर या अन्य कोई उत्तम शिवलिंग हो) पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का संकल्प इस प्रकार लें-
ममाखिलपापक्षयपूर्वकसलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थं च शिवपूजनमहं करिष्ये
व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर के पूजन में शिवपंचाक्षर (नम: शिवाय) मंत्र का जप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान, इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान की आरती व परिक्रमा करें। अंत में भगवान से प्रार्थना इस प्रकार करें-
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृत्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
संतुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।।
अगले दिन सुबह पुन: स्नानकर भगवान शंकर की पूजा करके पश्चात व्रत खोलना चाहिए।
पूजन के शुभ मुहूर्त
सुबह 8:10 से 9:40 बजे तक (चर)
सुबह 9:40 से 11:08 बजे तक (लाभ)
सुबह 11:08 से दोपहर 12:30 बजे तक (अमृत)
दोपहर 2:06 से 3:35 बजे तक (शुभ)
शाम 6:32 से रात 8:00 बजे तक(शुभ)
रात 8:00 से 9:30 बजे तक (अमृत)
रात 9:30 से 11:00 बजे तक (चर)
Friday, 8 March 2013
शास्त्रानुसार कैसे मनाएं महाशिवरात्रि
शास्त्रानुसार कैसे मनाएं महाशिवरात्रि
आध्यात्मिक उन्नतिके लिए ‘पिंडसे ब्रह्मांडतक’की यात्रा आवश्यक है । इसका अर्थ है कि जो तत्त्व ‘ब्रह्मांड’में अर्थात् शिवमें हैं, उनका ‘पिंड’में अर्थात् जीवमें होना आवश्यक है । तब ही जीव शिवसे एकरूप हो सकता है । पानीकी बूंदमें तेलका अंशमात्र भी हो, तो वह पानीमें पूर्णरूपसे घुल नहीं सकता । उसी प्रकार जबतक शिवभक्त शिवकी सर्व विशेषताएं आत्मसात् नहीं कर लेता, तबतक वह शिवसे एकरूप नहीं हो सकता अर्थात्, उसकी सायुज्य मुक्ति नहीं हो सकती । अतः शिवरात्रिके अवसरपर हमारे पाठक शिवजीकी विशेषताएं एवं उपासना जानकर शिवजी से एकरूप होनेका प्रयास कर पाएं, इस हेतु शिवजीकी कुछ विशेषतापूर्ण जानकारी इस पृष्ठपर दे रहे हैं । इस वर्ष महाशिवरात्रि २० फरवरीको है ।
महाशिवरात्रि किसे कहते हैं ?
भगवान् शिव रात्रिके प्रहर विश्राम करते हैं । उस प्रहरको, अर्थात् शिवजीके विश्रामकालको महाशिवरात्रि कहते हैं । पृथ्वीका एक वर्ष अर्थात् स्वर्गलोकका एक दिन । पृथ्वी स्थूल है । स्थूलको ब्रह्मांडमें प्रवास करनेमें अधिक समय लगता है । देवता सूक्ष्म होते हैं, इस कारण उनका वेग अधिक होता है । इसलिए उन्हें ब्रह्मांडमें यात्रा करनेमें अल्प समय लगता है । इसी कारण पृथ्वी एवं देवतामें एक वर्षका अंतर है ।
महाशिवरात्रिपर शिवजीकी उपासनाका शास्त्रीय आधार क्या है ?
शिवजीके विश्रामकालमें शिवजीका तत्त्वका कार्य थम जाता है, अर्थात् उस समय शिवजी समाधि-अवस्थामें होते हैं । शिवजीकी समाधि-अवस्था, अर्थात् शिवजीकी साधनाका समय । इसलिए उस समय शिवतत्त्व विश्व अथवा ब्रह्मांडके तमोगुण अथवा हलाहलको स्वीकार नहीं करता । ऐसेमें, ब्रह्मांडमें हलाहलका एवं अनिष्ट शक्तियोंका प्रभाव बहुत बढ जाता है । उसका प्रभाव हमपर न हो, इसलिए अधिकाधिक शिवतत्त्व आकृष्ट करनेवाले बिल्वपत्र, श्वेत पुष्प, रुद्राक्षकी मालाएं इत्यादि शिवपिंडीपर अर्पित कर वातावरणसे शिवतत्त्व आकृष्ट किया जाता है । ऐसा करनेसे अनिष्ट शक्तियोंका प्रभाव हमपर नहीं होता ।
महाशिवरात्रि व्रत किस प्रकार किया जाता है ?
‘फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको महाशिवरात्रि कहते हैं । महाशिवरात्रिका व्रतकाम्य तथा नैमित्तिक उपलब्धिके लिए रखा जाता है । इस व्रतके तीन अंग हैं - उपवास, पूजा तथा जागरण । शिव इस व्रतके प्रधान देवता हैं । इस व्रतकी विधि इस प्रकार बताई गई है - फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीको एकभुक्त (दिनमें एक समय अन्न ग्रहण करना) रहें । चतुर्दशीके दिन प्रातःकालमें व्रतका संकल्प करें । सायंकालमें नदीपर अथवा तालाबपर शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । शिवजीका ध्यान करें । तदोपरांत षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानीप्रीत्यर्थ तर्पण करें । प्रदोषकालमें शिवजीके मंदिर जाएं । नाममंत्र जपते हुए शिव जीको एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पण करें । पुष्पांजलि अर्पण कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्रका जाप हो जाए, तो शिवजीके मस्तकपर अर्पित किए गए पुष्प लेकर अपने मस्तकपर धारण करें और शिवजी से अपने अपराधोंके लिए क्षमायाचना करें । शिवरात्रिकी रात्रिके चारों प्रहरोंमें चार पूजा करनेका विधान है, जिसे यामपूजा कहा जाता है । प्रत्येक यामपूजामें देवताको अभ्यंगस्नान कराएं, अनुलेपन करें, साथ ही धतूरा, आम तथा बिल्वपत्र अर्पण करें । चावलके आटेके २६ दीप जलाकर देवताकी आरती उतारें । पूजाके अंतमें १०८ दीप दान करें । प्रातःकाल स्नान कर, पुनः शिवपूजा करें । पारण अर्थात् व्रतकी समाप्तिके लिए बशह्मणभोजन कराएं । (पारण चतुर्दशी समाप्त होनेसे पूर्व ही करना योग्य होता है ।) ब्राह्मणोंके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत संपन्न होता है । बारह, चौदह अथवा चौबीस वर्ष जब व्रत हो जाए, तो उद्यापन करें ।
शिवजीके नामजपका महत्त्व
महाशिवरात्रिपर नित्यकी तुलनामें १००० गुणाकार्यरत शिवतत्त्वका लाभ पाने हेतु
‘ॐ नमः शिवाय।' नामजप अधिकाधिक करें ।
(संदर्भ : सनातनका ग्रंथ - ‘शिव’)
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आध्यात्मिक उन्नतिके लिए ‘पिंडसे ब्रह्मांडतक’की यात्रा आवश्यक है । इसका अर्थ है कि जो तत्त्व ‘ब्रह्मांड’में अर्थात् शिवमें हैं, उनका ‘पिंड’में अर्थात् जीवमें होना आवश्यक है । तब ही जीव शिवसे एकरूप हो सकता है । पानीकी बूंदमें तेलका अंशमात्र भी हो, तो वह पानीमें पूर्णरूपसे घुल नहीं सकता । उसी प्रकार जबतक शिवभक्त शिवकी सर्व विशेषताएं आत्मसात् नहीं कर लेता, तबतक वह शिवसे एकरूप नहीं हो सकता अर्थात्, उसकी सायुज्य मुक्ति नहीं हो सकती । अतः शिवरात्रिके अवसरपर हमारे पाठक शिवजीकी विशेषताएं एवं उपासना जानकर शिवजी से एकरूप होनेका प्रयास कर पाएं, इस हेतु शिवजीकी कुछ विशेषतापूर्ण जानकारी इस पृष्ठपर दे रहे हैं । इस वर्ष महाशिवरात्रि २० फरवरीको है ।
महाशिवरात्रि किसे कहते हैं ?
भगवान् शिव रात्रिके प्रहर विश्राम करते हैं । उस प्रहरको, अर्थात् शिवजीके विश्रामकालको महाशिवरात्रि कहते हैं । पृथ्वीका एक वर्ष अर्थात् स्वर्गलोकका एक दिन । पृथ्वी स्थूल है । स्थूलको ब्रह्मांडमें प्रवास करनेमें अधिक समय लगता है । देवता सूक्ष्म होते हैं, इस कारण उनका वेग अधिक होता है । इसलिए उन्हें ब्रह्मांडमें यात्रा करनेमें अल्प समय लगता है । इसी कारण पृथ्वी एवं देवतामें एक वर्षका अंतर है ।
महाशिवरात्रिपर शिवजीकी उपासनाका शास्त्रीय आधार क्या है ?
शिवजीके विश्रामकालमें शिवजीका तत्त्वका कार्य थम जाता है, अर्थात् उस समय शिवजी समाधि-अवस्थामें होते हैं । शिवजीकी समाधि-अवस्था, अर्थात् शिवजीकी साधनाका समय । इसलिए उस समय शिवतत्त्व विश्व अथवा ब्रह्मांडके तमोगुण अथवा हलाहलको स्वीकार नहीं करता । ऐसेमें, ब्रह्मांडमें हलाहलका एवं अनिष्ट शक्तियोंका प्रभाव बहुत बढ जाता है । उसका प्रभाव हमपर न हो, इसलिए अधिकाधिक शिवतत्त्व आकृष्ट करनेवाले बिल्वपत्र, श्वेत पुष्प, रुद्राक्षकी मालाएं इत्यादि शिवपिंडीपर अर्पित कर वातावरणसे शिवतत्त्व आकृष्ट किया जाता है । ऐसा करनेसे अनिष्ट शक्तियोंका प्रभाव हमपर नहीं होता ।
महाशिवरात्रि व्रत किस प्रकार किया जाता है ?
‘फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको महाशिवरात्रि कहते हैं । महाशिवरात्रिका व्रतकाम्य तथा नैमित्तिक उपलब्धिके लिए रखा जाता है । इस व्रतके तीन अंग हैं - उपवास, पूजा तथा जागरण । शिव इस व्रतके प्रधान देवता हैं । इस व्रतकी विधि इस प्रकार बताई गई है - फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीको एकभुक्त (दिनमें एक समय अन्न ग्रहण करना) रहें । चतुर्दशीके दिन प्रातःकालमें व्रतका संकल्प करें । सायंकालमें नदीपर अथवा तालाबपर शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । शिवजीका ध्यान करें । तदोपरांत षोडशोपचार पूजा करें । भवभवानीप्रीत्यर्थ तर्पण करें । प्रदोषकालमें शिवजीके मंदिर जाएं । नाममंत्र जपते हुए शिव जीको एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र अर्पण करें । पुष्पांजलि अर्पण कर, अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ तथा मूलमंत्रका जाप हो जाए, तो शिवजीके मस्तकपर अर्पित किए गए पुष्प लेकर अपने मस्तकपर धारण करें और शिवजी से अपने अपराधोंके लिए क्षमायाचना करें । शिवरात्रिकी रात्रिके चारों प्रहरोंमें चार पूजा करनेका विधान है, जिसे यामपूजा कहा जाता है । प्रत्येक यामपूजामें देवताको अभ्यंगस्नान कराएं, अनुलेपन करें, साथ ही धतूरा, आम तथा बिल्वपत्र अर्पण करें । चावलके आटेके २६ दीप जलाकर देवताकी आरती उतारें । पूजाके अंतमें १०८ दीप दान करें । प्रातःकाल स्नान कर, पुनः शिवपूजा करें । पारण अर्थात् व्रतकी समाप्तिके लिए बशह्मणभोजन कराएं । (पारण चतुर्दशी समाप्त होनेसे पूर्व ही करना योग्य होता है ।) ब्राह्मणोंके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रत संपन्न होता है । बारह, चौदह अथवा चौबीस वर्ष जब व्रत हो जाए, तो उद्यापन करें ।
शिवजीके नामजपका महत्त्व
महाशिवरात्रिपर नित्यकी तुलनामें १००० गुणाकार्यरत शिवतत्त्वका लाभ पाने हेतु
‘ॐ नमः शिवाय।' नामजप अधिकाधिक करें ।
(संदर्भ : सनातनका ग्रंथ - ‘शिव’)
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Wednesday, 6 March 2013
अगर आप बहुत कर्ज में डूवे हुए है -
महाशिवरात्रि " 10-3-2013 . . . विशेष = अगर आप बहुत कर्ज में डूवे हुए है - और उससे मुक्त होने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा है -तो एक छोटा सा काम करे - महाशिवरात्रि को सुबह उठते ही सबसे पहले एक मुठी चावल - छत्त मे पक्षियों के लिए डाल दे - और प्रतिदिन सुबह चावल डाले . मात्र 15 दिनों में आपको कर्ज से निकलने का रास्ता मिलने लगेगा
मानसिक अशांति निवारण उपाय
मानसिक अशांति निवारण उपाय
आज की भागदौड़ से भरी जिंदगी मैं हर व्यक्ति अपने काम में व्यस्त हैं। जिस कारण से अधिकतर लोग मानसिक शांति से ग्रस्त होते है। व्यस्ता एवं भौतिकता से भरी दिनचार्या में व्यक्ति के पास अपने स्वयं के लिए भी वक्त ही नहीं होता है। यदि आप इस तरह की परेशानी से ग्रस्त हैं और आप मानसिक कष्ट तनाव इत्यादी से मुक्ति चाहते हैं, तो इस वास्तु सुझावो को जीवन में अवश्य आजमाकर देख ले आपको निश्चित लाभ प्राप्त होगा। * अपने शयन कक्ष में रात में झूठे बर्तन न रखें। सोने से पूर्व बर्तनो को साफ करले। इससे स्त्री वर्ग का स्वास्थ्य प्रभावित होता हैं व धन का अभाव बना रहता हैं। * मानसिक तनाव हो, जाए तो कमरे में शुद्ध घी का दीपक जला कर रखें। * शयन कक्ष में झाड़ू इत्यादि सफाई की सामग्री न रखें। इससे व्यर्थ की चिंता रहेगी। * यदि मानसिक तनाव अधिक हो जाएं तो, तकिए के नीचे लाल चंदन रखकर सोएं लाभ प्राप्त होगा। * सुबह-संध्या पूजन में घी और कपूरका दिप अवश्य जलाये। जिससे निवास स्थान या व्यवसायिक स्थानो से नकारात्मक उर्जा दूर होती हैं। * शास्त्रोक्त नियमो के अनुशार संध्या समय अर्थात धूप-दिप के समय सोना, खाना, स्नान करना वर्जित माना गया हैं। अतः इन कार्यो को करने से त्यागदे। * संध्या समय अर्थात धूप-दिप के समय हाथ-पैर धो सकते हैं। * धूप-दिप के समय अपने निवास स्थान या व्यवसायिक स्थानो पर सुगंधित व पवित्र अगरबत्ति, धुप इत्यादि अवश्य करें।
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