Friday, 27 July 2012

कुछ महत्वपूर्ण बातें-

कुछ महत्वपूर्ण बातें-
१—शिव की प्रदक्षिणा के लिए शास्त्र का आदेश है की इनकी अर्ध प्रदक्षिणा करनी चाहिए.
२–दुर्गाजी की एक , सूर्य की सात, गणेश की तीन, विष्णु की चार, और शिव की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए.{नारद पुराण},
३–पूजन में जिस सामग्री की कमी हो , उसकी पूर्ति मानसिक भावना से करनी चाहिए, “असम्पनम मनसा सम्पादयेत “
४–या उस -उस सामग्री के लिए अक्षत -फूल या जल चढ़ा दें.
५–केवल नैवेद्य चढाने से या चन्दन फूल चढाने से भी पूजा मान ली जाती है
६–पञ्च देव-सूर्य,गणेश,दुर्गा शिव विष्णु,पञ्च देव कहे गए हैं इनकी पूजा सभी शुभ कार्यों में करनी चाहिए, {मत्स्य पुराण}
७–गृहस्थ एक मूर्ति की ही पूजा न करें ,किन्तु अनेक देवमूर्ति की पूजा करें,इससे कामना पूर्ण होती है

Thursday, 26 July 2012

सावन माह में ये करें :-

सावन माह में ये करें :-
1. पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर और शहद) चढ़ाने के लिए विशेष मंत्र {कामधेनु समुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम्। पावनं यज्ञहेतुश्च पय: स्नानाय गृहृताम्।। ऊँ शिवाय नम:। पय: स्नान समर्पयामि} इसके बाद अन्य शास्त्रोक्त पूजा सामग्रियों का चढ़ावा करें।

2. शिवलिंग के दक्षिण दिशा की ओर बैठकर यानी उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पूजा और अभिषेक शीघ्र फल देने वाला माना गया है।

3. विवाह में अड़चन :- रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं।

4. धन प्राप्ति :- किसी नदी या तालाब जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं, रोज।

5. सुख-समृद्धि :- नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं, रोज।

6. अन्न की कमी :- गरीबों को भोजन कराएं,रोज।

7. मनोकामनाएं :- 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊँ नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं साथ ही एकमुखी रुद्राक्ष भी अर्पण करें।

8. शनि दोष :- (I) महामृत्युंजय मंत्र का पाठ भी बहुत असरदार है, (II) रुद्र अवतार हनुमान की उपासना करें, (III) सात तरह के अनाज का दान भी करना शनि कृपा का श्रेष्ठ उपाय है, (IV) शिव मंत्रों का पाठ भी शनि पीड़ा से रक्षा करता है। {ऊँ कालकालाय नम:}, {ऊँ नीललोहिताय नम: }, (V) केले या गाय के दूध से बनी मिठाई का भोग अर्पित कर धूप व घी का दीप लगाएं। इसके बाद शिव मंत्र का स्मरण करें –
{शंकराय नमस्तुभ्यं नमस्ते करवीरक।
त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं महेश्वरमत: परम्।।
नमस्तेस्तु महादेव स्थावणे च तत: परम्।
नम: पशुपते नाथ नमस्ते शम्भवे नम:।।
नमस्ते परमानन्द नम: सोमर्धधारिणे।
नमो भीमाय चोग्राय त्वामहं शरणं गत:।। }
शिव पूजा, मंत्र स्मरण के बाद आरती करें। (VI) शनिवार को श्री हनुमान के चरणों में जाकर काली उड़द चढ़ाएं। (VII) बालकृष्ण को केसर चंदन लगाकर माखन-मिश्री का भोग अर्पित करें और शनि की प्रसन्नता की कामना करें।

9. बिल्वपत्र न तोड़े :- चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्राति (सूर्य का राशि बदल दूसरी राशि में प्रवेश), सोमवार, नए बिल्वपत्रों की जगह पर पुराने बिल्वपत्रों को जल से पवित्र कर शिव पर चढ़ाए जा सकते हैं।

10. लक्ष्मी प्राप्ति :- पंचोपचार पूजा में चंदन, अक्षत के बाद तीन पत्ती वाले 11, 21, 51 या श्रद्धानुसार ज्यादा से ज्यादा बिल्वपत्र शिवलिंग पर इस मंत्र को बोलते हुए चढ़ाएं {त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं त्रयायुधम। त्रिजन्म पापसंहारं मेकबिल्वं शिवार्पणम।।}, शिव मंत्र जप या स्तुति कर शिव आरती करें। खुशहाल, धनी और सेहतमंद रहने की कामना करें।

Wednesday, 25 July 2012

वास्तु दोष निवारक सरलतम प्रयोग

समाज में एक ऐसा वर्ग है जो वास्तुषास्त्र के उपक्रमों को अमीरों के चोचले मानता है। बौद्धिकता से मनन करें तो आप पाऐंगे कि जहां उत्तर और पूर्वमुखी घर हैं, वहां दक्षिण और पष्चिम मुखी घर भी हैं। जहां भवन में उत्तरी-पूर्वी भाग में शौचालय बनें हैं, वहां वैसे ही भवन के अन्यत्र कोणांे में भी हंै। शुभत्व के जहां समस्त संसाधन गृह निर्माण आदि में लगाए गए हैं, वहां अनेक में इन सब से कोई भी शुभत्व का प्रयास नहीं किया गया है . .आदि.. आदि। यदि आप आंकड़े जमा करें तो पाऐंगे कि कहीं दक्षिण अथवा पष्चिम मुखी भवनों में निवास करने वाले तुलनात्मक रुप से अधिक फल-फूल रहे हैं। जिन भवनों में ईषान कोंण में शौचालाय बनें हैं वहां के लोग अन्यत्र कोंणो में बने शौचालयों की तुलना में अधिक स्वस्थ हैं अथवा अधिक संपन्न हैं। तो क्या हम उस वर्ग विषेष की बात मान कर स्वीकार कर लें कि वास्तुषास्त्र के अनुसार किए गए निर्माण आदि से सामान्यतया कोई अंतर नहीं पड़ता? आपके अपने व्यक्तिगत अनुभव में भी ऐसे प्रकरण अवष्य आए होंगे कि जहां भवन का निर्माण पूर्णतया शास्त्रोक्त उपायोें से किया गया है फिर भी उसके स्वामी अथवा उसके परिजन कष्ट भरा जीवन जी रहे हैं। जब आप वास्तु पंडित, ज्योतिष मनीषी, तांत्रिक, मांत्रिक आदि के पास गए होंगे तो उसने तत्काल गणना कर दी होगी और कह दिया होगा कि भवन का वास्तु तो बिल्कुल ठीक है परन्तु जनम पत्री में गृह नक्षत्रों का योग विपरीत बन कर कष्ट कारी सिद्ध हो रहा है अथवा किसी ने कुछ कर दिया है अथवा देखने में तो सब ठीक है परन्तु आपके पितर रुष्ट हैं..आदि..आदि।

कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति का जीवन किसी एक घटक विषेष से प्रभावित नहीं हो रहा। अध्यात्म के मार्ग में जा कर, अंड-पिंड सिद्धांत को समझ कर, प्रारब्ध-पुरुषार्थ आदि की गूड़ता को मनन कर ही इस गूड़ रहस्य को समझा जा सकता है। प्रारब्ध के कर्मानुसार हम कष्ट भोग रहे हैं। लाख प्रयास, क्रम-उपक्रम करने पर भी हमेें आषातीत फल नहीं मिल पा रहे। किस प्रयास आदि से हमें लाभ मिल जाए यह दृष्ट नहीं है। इसलिए एक को गले न लगा कर मानव कल्याण के लिए किए जा रहे प्रयासों को नियमित करते रहें, पता नहीं कौन सा उपक्रम आपको रास आ जाए।
यदि आपको कहीं आभास हो कि सब कुछ होते हुए भी वास्तु अथवा अन्य किन्हीं दोषों के कारण आप कष्ट भोग रहे हैं तो निम्न सरलतम प्रयोग भी कर के देख लें, पता नहीं कौन सा प्रयोग आपके लिए फिट बैठ जाए।

प्रयोग 1.
मकान, दुकान अथवा अन्य कोई भवन निर्माण के समय अलग-अलग पूजा-अर्चना करना प्रचलित है। पूजा-पाठ का आप जो भी विधान अपना लें, थोड़ा है। आस्था हो तो यह प्रयोग करके देखें, घर में कोई दोष नही आ पाएगा।
एक छोटा सा तंाबे का ढक्कन वाला लोटा लें, उसे धोकर चमका लें। लोटे में तंाबे के पांच छेद वाले सिक्के, छोटा सा चांदी का बना नाग और नागिन का जोड़ा, हनुमान जी के चरणों का थोड़ा सा सिन्दूर, लोहे का छोटा सा एक त्रिषूल तथा चांदी की एक जोड़ी पादुकाएं रख कर उसमें गंगा जल भर दें। लोटे का मुंह अच्छी तरह से बंद कर दें। जिससे जल छलक कर बाहर न गिरे। अब इसको घर, दुकान आदि की नींव में मुख्य द्वार के दांए भाग में दबा दें। यदि घर तैयार हो चुका हो और कोई सज्जन यह प्रयोग करना चाहें तो वह यह सामग्री मुख्य द्वार के दांयी ओर कहीं ऐसे पवित्र स्थान में दबा दें जहां से इसके दुबारा निकलने की संभावना न हो।
यदि भवन के आस-पास उपयुक्त स्थान उपलब्ध हो तो वहाॅ अषोक, सिरस, केले, श्वेतार्क आदि के पेड़ लगा लें। पाठकों का भ्रम दूर कर दूॅ। जब तक वृक्ष की परछांई भवन पर नहीें पड़ती, वास्तु दोष नहीं लगता। घर के सामने घनी सी तुलसी की झाड़ लगा लें। यह सब उपक्रम घर में सकारात्मक ऊर्जा का समावेष करते हैं।

प्रयोग 2.
घर में सदैव श्री का वास रहे तथा वास्तु जनित किसी भी प्रकार के दोष के निदान के लिए घर की किसी लड़की, बहु, बेटी आदि से यह प्रयोग करवाएं।
गुरुवार के दिन मुख्य द्वार के दाएं अथवा बांए ओर गंगा जल से पवित्र करें। यहाॅ दाएं हाथ की अनामिका तथा तथा हल्दी-दही के घोल से एक स्वास्तिक बनाएं। इस पर थोड़ा सा गुड़ रखकर एक बूंद शहद टपका दें। प्रत्येक गुरुवार को यह क्रम दोहरा दिया करें। कुछ समय बाद आपको घर का वातावरण सुखद लगने लगेगा।

प्रयोग 3.
किसी भी धातु का एक कटोरा लें। उसमें चावल, नागकेसर भर लें। यदि इनको किसी शुभ मुहूर्त में अभिमंत्रित करके भरा जाता है तो अधिक प्रभावषाली सिद्ध होगा। इस कटोरे में रखे चावलों में एक सिक्का, पीली बड़ी कौड़ी, पीली बड़ी हरड़ तथा छोटे से नृत्य करते हुए एक गणपति स्थापित कर दें। गणपति किसी भी धातु, काॅच, काष्ठ आदि के आप ले सकते हैं। सामग्री भरे हुए इस कटोरे को घर के किसी ईषान कोण में धरती से कुछ ऊॅचाई पर रख दें। भवन के वास्तु दोष निवारण में यह एक अचूक प्रयोग सिद्ध होगा। बहु-मंजिला भवन है अथवा भवन में अनेक कमरे हैं तो आप प्रत्येक तल तथा प्रत्येक कमरे के उत्तर-पूर्वी कोण में भी यह सामग्री रख सकते हैं। इसके लिए आपको उतनी संख्या में सामग्री भरे कटोरे तैयार करने होंगे जितने आप प्रयोग करने जा रहे हैं।

प्रयोग 4.
घर में सौभाग्य जगाने, प्रसन्न वातावरण बनाने अथवा भांति-भांति की सुगन्ध कर देवी-देवताओं को रिझाने के उपक्रम किए जाते हैं। अपनी-अपनी सामथ्र्य , श्रद्धानुसार लोग धूप, अगरबत्ती आदि का प्रयोग करते हैं। एक सलाह आपको अवष्य दूॅगा कि घटिया धूप, अगरबत्ती का प्रयोग अपने विवेक से ही करें। यह सड़े हुए मोबिल आॅयल से तैयार की जाती है। इससे वास्तु दोष दूर हो या न हो, देवी-देवता प्रसन्न हो अपनी कृपा दृष्टि आप पर तथा आपके भवन पर डालें या न डालें परन्तु यह निष्चित है कि आपके फैफड़े अवष्य खराब हो जाऐंगे।
गाय के गोबर के दहकते हुए कण्डे पर शुद्ध घी में डुबोई लौंग, कपूर, गोला गिरि तथा बताषा अथवा चीनी डालकर धूनी करें। इस भीनी-भीनी मदमस्त महक से आपका चित्त प्रसन्न हो उठेगा। भवन के वातावरण में धीरे-धीरे सकारात्मक ऊर्जा भरने लगेगी।

प्रयोग 5.
किसी शुभ मुहूर्त में हल्दी से रंगे एक पीले कपड़े में थोड़ी सी नागकेसर, एक तांबे का सिक्का, हल्दी की एक अखण्डित गांठ, एक मुट्ठी नमक, एक पीली बड़ी हरड़, एक मुट्ठी गेंहू और चांदी अथवा तांबे की एक जोड़ा पादुकाएं बांधकर पोटली बना लें। इस पोटली को घर की रसोई में कहीं ऐसे स्थान पर लटका दें जहां आते-जाते किसी की दृष्टि उस पर न पड़े। जब लगे कि पोटली गन्दी होने लगी है तो किसी शुभ मुहूर्त में उपरोक्त सामग्री पीले कपड़े में बांधकर पुनः लटका दिया करें तथा पुरानी पोटली केा जल में कहीं विसर्जित कर दिया करें, आपके घर में सौभाग्य का आगमन होने लगेगा।

प्रयोग 6.
अपने दायें हाथ की आठ अंगुल प्रमाण में चार लोहे की कील ले लें। इतने ही बड़े चार टुकड़े बढ़ अथवा पीपल की जड़ के काट लें। इन्हें चारों कीलों के साथ अलग-अलग बांध लें। अपने भूखण्ड के चारों कोनों में इन्हेें दबा दें। घर को चारों तरफ से लोहे, तांबे तथा सामथ्र्य हो तो चांदी के तारों से इस प्रकार दबा दें, कि तार चारों ओर दबी हुई कीलों से स्पर्ष करते हुए रहें। भूखण्ड के जिस स्थान में ईषान कोंण आ रहा हो, वहाॅ तारों को अलग रखें। यहाॅ पीपल अथवा बढ़ के नौ पत्तों से, एक पत्ता बीच में रखकर अष्टदल कमल बनाएं। इस अष्टदल कमल की अपनी श्रद्धानुसार पूजा-अर्चना करें, इस पर कोई विग्रह, यंत्र अथवा अन्य कोई प्रतिष्ठित मूर्ती, चित्रादि रखकर चारों तरफ से ढक दें। जैसा भी निर्माण कार्य हो रहा हो, वह इसके बाद प्रारम्भ करवाएं। वास्तु निवारण का यह एक अचूक प्रयोग सिद्ध होगा।

प्रयोग 7.
पुष्य नक्षत्र में जड़ सहित चिरचिटे का एक पौधा उखाड़ लाएं। भवन में कहीं भी गड्ढा खोदकर इस पौधे को इस प्रकार से दबा दें कि पत्तियाॅ नीचे रहें और जड़ वाला भाग ऊपर। बद्नजर, किसी के कुछ करे-धरे का दुष्प्रभाव आदि में यह प्रयोग रामबांण सा सिद्ध होगा।

Friday, 20 July 2012

विवाह के बाद रिश्तों को कैसे बचाएं



विवाह के बाद रिश्तों को कैसे बचाएं

विवाह के समय लिए जाने वाले सात फेरे, सात जन्मों तक का सफर साथ-साथ तय करने का वचन दिलवाते हैं। विवाह का यह सुखद बंधन मात्र अग्नि के इर्द-गिर्द घूमने की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ कुछ अनकही, अनलिखी बातों का प्रण लेना भी होता है जिसमें जीवन संघर्ष में, सुख-दुख में साथ निभाने की, समर्पण से एक-दूसरे का सम्मान करने की, आपस की भावनाओं को समझने की, सबसे महत्वपूर्ण अपने-अपने अहं को त्याग 'मैं-तू' का वाद छोड़ 'हम' शब्द को आत्मसात करने की आवश्यकता होती है।

सात जन्मों के सफर का फलसफा पहले ही जनम में बोझ न बन बैठे, रिश्तों में बिखराव न आए व संबंध सतत ऊर्जावान बने रहें, इसलिए निम्न बातों की एहतियात बरतना आवश्यक है।

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प्रेम को सर्वोपरि समझ उस पर किसी चीज को हावी न होने दें।

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पति या पत्नी से नहीं, संपूर्ण परिवार से जुड़ने का मन बनाएं।

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यदि संभव हो तो दूसरे की आदतों व व्यवहार से समझौता करने की कोशिश करें।

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कभी-कभी स्वयं की गलती मानने का बड़प्पन भी दिखाएं। एक-दूसरे के दोषों को नजरअंदाज करना भी सीखें।

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अपने साथी के गुणों की कद्र करें। छोटे-छोटे कार्यों की प्रशंसा कर प्रोत्साहन बढ़ाएं।

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हर समस्या का समाधान चर्चा से ढूंढें।

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एक-दूसरे से व्यर्थ की अपेक्षा कम करें।

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अपने साथी की दूसरे किसी से कभी तुलना न करें। एक-दूजे पर भरपूर विश्वास करें।

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आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इच्छा व आकांक्षाओं को सीमित रखें।

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हर बात में एक-दूसरे की राय लेना व समान महत्व देकर निर्णय लेने की कोशिश करें।

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आपसी प्यार व आकर्षण में कमी न आने दें। प्यार में छोटे-मोटे झगड़े होते रहते हैं। उनकी उम्र यथासंभव घटाकर फिर प्रेम से एक होना ही सफल वैवाहिक जीवन का राज है। इसे याद रखें।

इन सतर्कताओं के साथ सात फेरों के साथ प्रारंभ हुआ सफर सात जन्मों तो क्या प्रत्येक जन्म में इसी साथी की चाह रखेगा। यही हमारी संस्कृति व सभ्यता का अभिन्न अंग है।

Tuesday, 17 July 2012

सम्पूर्ण शिवपूजन प्रकार और पद्धति


सम्पूर्ण शिवपूजन प्रकार और पद्धति

शिवपूजन में ध्यान रखने जैसे कुछ खास बाते 
(स्नान कर के ही पूजा में बेठे
(साफ सुथरा वस्त्र धारण कर ( हो शके तो शिलाई बिना का तो बहोत अच्छा )
(आसन एक दम स्वच्छ चाहिए ( दर्भासन हो तो उत्तम )
(पूर्व या उत्तर दिशा में मुह कर के ही पूजा करे
(बिल्व पत्र पर जो चिकनाहट वाला भाग होता हे वाही शिवलिंग पर चढ़ाये ( कृपया खंडित बिल्व पत्र मत चढ़ाये )
(संपूर्ण परिक्रमा कभी भी मत करे ( जहा से जल पसार हो रहा हे वहा से वापस  जाये )
(पूजन में चंपा के पुष्प का प्रयोग मत करे
(बिल्व पत्र के उपरांत आक के फुलधतुरा पुष्प या नील कमल का प्रयोग अवश्य कर शकते हे
(शिव प्रसाद का कभी भी इंकार मत करे ( ये सब के लिए पवित्र हे )
पूजन सामग्री : - शिव की मूर्ति या शिवलिंगम , अबिल गुलालचन्दन ( सफ़ेद ) अगरबत्ती धुप ( गुग्गुल ) बिलिपत्रतुलसीदूर्वाचावलपुष्पफलपान-सोपारीपंचामृत,
आसनकलशदीपकशंखघंटआरती यह सब चीजो का होना आवश्यक हे
पूजन विधि : जो इंसान भगवन शंकर का पूजन करना चाहता हे उसे प्रातः कल जल्दी उठकर प्रातः कर्म पुरे करने के बाद पूर्व दिशा या इशान कोने की और अपना मुख रख कर .. प्रथम आचमन करना चाहिए बाद में खुद के ललाट पर तिलक करना चाहिए बाद में निन्म मंत्र बोल कर शिखा बांधनी चाहिए
शिखा मंत्र : ह्रीं उर्ध्वकेशी विरुपाक्षी मस्शोणित भक्षणे / तिष्ठ देवी शिखा मध्ये चामुंडे ह्य पराजिते //
आचमन मंत्र :  केशवाय नमः /  नारायणाय नमः /  माधवी नमः /  शिवाय नमः
तीनो बार पानी हाथ में लेकर पीना चाहिए और बाद में  गोविन्दाय नमः बोल हाथ धो लेने चाहिए बाद में बाये हाथ में पानी ले कर दाये हाथ से पानी .. अपने मुहकर्णआँखनाकनाभिह्रदय और मस्तक पर लगाना चाहिए और बाद में ह्रीं नमो भगवते वासुदेवाय बोल कर खुद के चारो और पानी के छीटे डालने चाहिए
ह्रीं नमो नारायनायम बोल कर प्राणायाम करना चाहिए
'ह्रीं अपवित्रपवित्रो  सर्वावस्था गतोपी  / स्मरेत पूंडरीकाक्षम सहबाह्याभ्यांतर सूचि // ( बोल कर शारीर पर जल का छंताकाव करे - शुद्धि करन के लिए )
न्यास : निचे दिए गए मंत्र बोल कर बाजु में लिखे गए अंग पर अपना दाया हाथ का स्पर्श करे
ह्रीं नं पादाभ्याम नमः / ( दोनों पाव पर ),
ह्रीं मों जानुभ्याम नमः / ( दोनों जंघा पर )
ह्रीं भं कटीभ्याम नमः / ( दोनों कमर पर )
ह्रीं गं नाभ्ये नमः / ( नाभि पर )
ह्रीं वं ह्रदयाय नमः / ( ह्रदय पर )
ह्रीं ते बाहुभ्याम नमः / ( दोनों कंधे पर )
ह्रीं वां कंठाय नमः / ( गले पर )
ह्रीं सुं मुखाय नमः / ( मुख पर )
ह्रीं दें नेत्राभ्याम नमः / ( दोनों नेत्रों पर )
ह्रीं वां ललाटाय नमः / ( ललाट पर )
ह्रीं यां मुध्र्ने नमः / ( मस्तक पर )
ह्रीं नमो भगवते वासुदेवाय नमः / ( पुरे शरीर पर )
तत पश्यात भगवन शंकर की पूजा करे
(पूजन विधि निन्म प्रकार से हे )
तिलक मन्त्र : ह्रीं स्वस्ति तेस्तु द्विपदेभ्यश्वतुष्पदेभ्य एवच / स्वस्त्यस्त्व पादकेभ्य श्री सर्वेभ्यः स्वस्ति सर्वदा //
नमस्कार मंत्रो : ह्रीं श्री गणेशाय नमः / ह्रीं इष्ट देवताभ्यो नमः /
ह्रीं कुल देवताभ्यो नमः / ह्रीं ग्राम देवताभ्यो नमः /
ह्रीं स्थान देवताभ्यो नमः / ह्रीं सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः /
ह्रीं गुरुवे नमः / ह्रीं माता पिता भ्याम नमः
शांति शांति शांति
गणपति स्मरण :
ह्रीं सुमुखश्वेक्दंतश्व कपिलो गज कर्णक / लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक : //
धुम्र्केतुर्गानाध्याक्शो भालचन्द्रो गजाननः / द्वाद्शैतानी नामानी यः पठेच्छुनुयादापी //
विध्याराम्भे विवाहे  प्रवेशे निर्गमेस्त्था / संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य  जायते //
शुक्लाम्बर्धरम देवं शशिवर्ण चतुर्भुजम / प्रसन्न वदनं ध्यायेत्सर्व विघ्नोपशाताये //
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि सम प्रभु / निर्विघम कुरु में देव सर्वकार्येशु सर्वदा //
संकल्प :अधे त्यादी अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथो अमुक वासरे नित्य नियमपूर्वक पहस्थितानाम पूजनं करिष्ये
बाये हाथ में चावल रख कर दाया हाथ ऊपर ढके )
द्विग्रक्षण - मंत्र : ह्रीं यादातर संस्थितम भूतं स्थानमाश्रित्य सर्वात:/ स्थानं त्यक्त्वा तुं तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गछतु //
यह मंत्र बोल कर चावालको अपनी चारो और डाले
वरुण पूजन : ह्रीं अपाम्पताये वरुणाय नमः / सक्लोप्चारार्थे गंधाक्षत पुष्पहसमपुज्यामी //
यह बोल कर कलश के जल में चन्दन - पुष्प डाले और कलश में से थोडा जल हाथ में ले कर निन्म मंत्र बोल कर पूजन सामग्री और खुद पर वो जल के छीटे डाले
पवित्रीकरण मंत्र : 'ह्रीं अपवित्रपवित्रो  सर्वावस्था गतोपी  / स्मरेत पूंडरीकाक्षम सहबाह्याभ्यांतर सूचि //
बोल कर ह्रीं नारायणाय नमः  बार बोले )
दीप पूजन : ह्रीं दिपस्त्वं देवरूपश्च कर्मसाक्षी जयप्रद: / साज्यश्च वर्तिसंयुक्तं दीपज्योती जमोस्तुते //
बोल कर दीप पर चन्दन और पुष्प अर्पण करे )
शंख पूजन : ह्रीं लक्ष्मीसहोदरस्त्वंतु विष्णुना विधृतकरे / निर्मितः सर्वदेवेश्च पांचजन्य नमोस्तुते //
बोल कर शंख पर चन्दन और पुष्प चढ़ाये )
घंट पूजन : देवानं प्रीतये नित्यं संरक्षासां  विनाशने / घंट्नादम प्रकुवर्ती ततः घंटा प्रपुज्यत //
बोल कर घंट नाद करे और उस पर चन्दन और पुष्प चढ़ाये )
ध्यान मंत्र : ह्रीं ध्यायामि दैवतं श्रेष्ठं नित्यं धर्म्यार्थप्राप्तये / धर्मार्थ काम मोक्षानाम साधनं ते नमो नमः //
बोल कर भगवान शंकर का ध्यान करे )
आहवान मंत्र : ह्रीं आगच्छ देवेश तेजोराशे जगत्पतये / पूजां माया कृतां देव गृहाण सुरसतम //
बोल कर भगवन शिव को आह्वाहन करने की भावना करे )
आसन मंत्र : ह्रीं सर्वकश्ठंयामदिव्यम नानारत्नसमन्वितम / कर्त्स्वरसमायुक्तामासनम प्रतिगृह्यताम //
बोल कर शिवजी कोई आसन अर्पण करे )
खाध्य प्रक्षालन : ह्रीं उष्णोदकम निर्मलं  सर्व सौगंध संयुत / पद्प्रक्षलानार्थय दत्तं ते प्रतिगुह्यतम //
बोल कर शिवजी के पैरो को पखालने हे )
अर्ध्य मंत्र : ह्रीं जलं पुष्पं फलं पत्रं दक्षिणा सहितं तथा / गंधाक्षत युतं दिव्ये अर्ध्य दास्ये प्रसिदामे //
बोल कर जल पुष्प फल पात्र का अर्ध्य देना चाहिए )
पंचामृत स्नान : ह्रीं पायो दाढ़ी धृतम चैव शर्करा मधुसंयुतम / पंचामृतं मयानीतं गृहाण परमेश्वर //
बोल कर पंचामृत से स्नान करावे )
स्नान मंत्र : ह्रीं गंगा रेवा तथा क्षिप्रा पयोष्नी सहितास्त्था / स्नानार्थ ते प्रसिद परमेश्वर //
(बोल कर भगवन शंकर को स्वच्छ जल से स्नान कराये और चन्दन पुष्प चढ़ाये )
संकल्प मंत्रअनेन स्पन्चामृत पुर्वरदोनोने आराध्य देवताप्रियत्नाम / ( तत पश्यात शिवजी कोई चढ़ा हुवा पुष्प ले कर अपनी आख से स्पर्श कराकर उत्तर दिशा की और फेक दे ,
बाद में हाथ को धो कर फिर से चन्दन पुष्प चढ़ाये )
अभिषेक मंत्र : ह्रीं सहस्त्राक्षी शतधारम रुषिभीपावनं कृत / तेन त्वा मभिशिचामी पवामान्य : पुनन्तु में //
बोल कर जल शंख में भर कर शिवलिंगम पर अभिषेक करे )
बाद में शिवलिंग या प्रतिमा को स्वच्छ जल से स्नान कराकर उनको साफ कर के उनके स्थान पर बिराजमान करवाए
वस्त्र मंत्र : ह्रीं सोवर्ण तन्तुभिर्युकतम रजतं वस्त्र्मुत्तमम / परित्य ददामि ते देवे प्रसिद गुह्यतम //
बोल कर वस्त्र अर्पण करने की भावना करे )
जनेऊ मन्त्र : ह्रीं नवभिस्तन्तुभिर्युकतम त्रिगुणं देवतामयम / उपवीतं प्रदास्यामि गृह्यताम परमेश्वर //
बोल कर जनेऊ अर्पण करने की भावना करे )
चन्दन मंत्र : ह्रीं मलयाचम संभूतं देवदारु समन्वितम / विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रति गृह्यताम //
बोल कर शिवजी को चन्दन का लेप करे )
अक्षत मंत्रअक्श्तास्च सुरश्रेष्ठ कंकुमुकता सुशोभित / माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर //
(बोल चावल चढ़ाये )
पुष्प मंत्र : ह्रीं नाना सुगंधी पुष्पानी रुतुकलोदभवानी  / मायानितानी प्रीत्यर्थ तदेव प्रसिद में //
बोल कर शिवजी को विविध पुष्पों की माला अर्पण करे )
तुलसी मंत्र : ह्रीं तुलसी हेमवर्णा  रत्नावर्नाम  मजहीम / प्रीटी सम्पद्नार्थय अर्पयामी हरिप्रियाम //
बोल कर तुलसी पात्र अर्पण करे )
बिल्वपत्र मन्त्र : ह्रीं त्रिदलं त्रिगुणा कारम त्रिनेत्र  त्र्ययुधाम / त्रिजन्म पाप संहारमेकं बिल्वं शिवार्पणं //
बोल कर बिल्वपत्र अर्पण करे )
दूर्वा मन्त्र : ह्रीं दुर्वकुरण सुहरीतन अमृतान मंगलप्रदान / आतितामस्तव पूजार्थं प्रसिद परमेश्वर शंकर : //
बोल करे दूर्वा दल अर्पण करे )
सौभाग्य द्रव्य : ह्रीं हरिद्राम सिंदूर चैव कुमकुमें समन्वितम / सौभागयारोग्य प्रीत्यर्थं गृहाण परमेश्वर शंकर : //
बोल कर अबिल गुलाल चढ़ाये और होश्के तो अलंकर और आभूषण शिवजी को अर्पण करे )
धुप मन्त्र : ह्रीं वनस्पति रसोत्पन्न सुगंधें समन्वित : / देव प्रितिकारो नित्यं धूपों यं प्रति गृह्यताम //
बोल कर सुगन्धित धुप करे )
दीप मन्त्र : ह्रीं त्वं ज्योति : सर्व देवानं तेजसं तेज उत्तम : / आत्म ज्योतिपरम धाम दीपो यं प्रति गृह्यताम //
बोल कर भगवन शंकर के सामने दीप प्रज्वलित करे )
नैवेध्य मन्त्र : ह्रीं नैवेध्यम गृह्यताम देव भक्तिर्मेह्यचलां कुरु / इप्सितम  वरं देहि पर  पराम गतिम् //
बोल कर नैवेध्य चढ़ाये )
भोजन मंत्र :  प्राणाय स्वाहा /  अपानाय स्वाहा /
ह्रीं उदानाय स्वाहा / ह्रीं समानाय स्वाहा / ( बोल कर भोजन कराये )
नैवेध्यांते हस्तप्रक्षालानं मुख्प्रक्षालानं आरामनियम  समर्पयामि /
बाद में एक बार जल रखे और फिर से ऊपर मुजब  कोल भोजन करवाए और  बार जल रक्खे और बाद में देव को चन्दन चढ़ाये
मुखवास मंत्र : ह्रीं एलालवंग संयुक्त पुत्रिफल समन्वितम / नागवल्ली दलम दिव्यं देवेश प्रति गुह्याताम // ( बोल कर पान सोपारी अर्पण करे )
दक्षिणा मंत्र : ह्रीं हेमं वा राजतं वापी पुष्पं वा पत्रमेव  / दक्षिणाम देवदेवेश गृहाण परमेश्वर शंकर > //
बोल कर अपनी शक्ति मुजब दक्षिणा अर्पण करे )
आरती मंत्र : ह्रीं सर्व मंगल मंगल्यम देवानं प्रितिदयकम / निराजन महम कुर्वे प्रसिद परमेश्वर / ( बोल कर एक बार आरती करे )
बाद में आरती की चारो और जल की धरा करे बाद में आरती पर पुष्प चढ़ाये और आरती दे और खुद भी आरती ले कर हाथ धो ले
पुष्पांजलि मंत्र : ह्रीं पुष्पांजलि प्रदास्यामि मंत्राक्षर समन्विताम / तेन त्वं देवदेवेश प्रसिद परमेश्वर //
बोल कर पुष्पांजलि अर्पण करे )
प्रदक्षिणा मंत्र : ह्रीं यानी पापानि में देव जन्मान्तर कृतानि  / तानी सर्वाणी नश्यन्तु प्रदिक्षिने पदे पदे //
बोल कर प्रदिक्षिना करे )
बाद में शिवजी के कोई भी मंत्र स्तोत्र या शिव शहस्त्र नाम स्तोत्र का पाठ करे अवश्य शिव कृपा प्राप्त होगी